गांधीजी ने कहा था- भीख मांग लूंगा लेकिन इसे बंद नहीं होने दूंगा, आज यहां नर्सरी से Phd तक होती पढ़ाई

जामिया को बनाने में स्वत्रंता सेनानी, मुहम्मद अली जौहर, हकीम अजमल खान, डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन, डॉक्टर मुख्तार अहमद अंसारी, अब्दुल मजीद ख्वाजा, मौलाना महमूद हसन जैसे लोगों का प्रमुख योगदान रहा. 1925 में जामिया, अलीगढ़ से दिल्ली आ गई.

नई दिल्ली. देश के दूसरे क्षेत्रों समेत पत्रकारिता और फिल्म (Film) इंडस्ट्री को स्टार देने वाली जामिया मिल्लिया इस्लामिया (Jamia millia islamia) आज 100 साल की हो गई है. अपने इस 100 साल के सफर में यह यूनिवर्सिटी आज देश के टॉप 10 विश्वविद्यालयों में शामिल है. हाल ही में केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय (Education Ministery) ने 40 केन्द्रीय विश्वविद्यालयों का आंकलन किया जिसमें जामिया को पहला स्थान मिला है.

आज़ादी से पहले सिर्फ बाबू (र्क्लक) देने वाली संस्था आज देश की टॉप सर्विस को अफसर दे रही है. लेकिन अंग्रेजी हुकूमत के दौरान इस संस्था ने एक ऐसा वक्त भी देखा है जब गांधीजी (Gandhi ji) को कहना पड़ा था कि “मुझे चाहें भीख ही क्यों न मांगनी पड़े, लेकिन मैं इस संस्था को बंद नहीं होने दूंगा.” आज यह देश की पहली संस्था है जहां नर्सरी से लेकर पीएचडी (Phd) तक की पढ़ाई होती है.

अलीगढ़ से दिल्ली ऐसे आई थी जामिया

पीआरओ अहमद अज़मी बताते हैं, ‘जामिया मिल्लिया इस्लामिया असहयोग आंदोलन और खिलाफत आंदोलन से उपजा एक विश्वविद्यालय है. महात्मा गांधी ने अगस्त 1920 में असहयोग आंदोलन का ऐलान करते हुए भारतवासियों से ब्रिटिश शैक्षणिक व्यवस्था और संस्थानों का बहिष्कार करने का आह्वान किया था. गांधीजी के आह्वान पर, उस समय अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के कुछ अध्यापकों और छात्रों ने 29 अक्तूबर 1920 को जामिया मिल्लिया इस्लामिया की बुनियाद अलीगढ़ में रखी थी.’

आज जामिया यूनिवर्सिटी को 100 साल पूरे हो गए हैं.

अंग्रेजों के डर से लोगों ने चंदा देना कर दिया था बंद

ब्रिटिश शिक्षा और व्यवस्था के विरोध में बने, जामिया मिल्लिया इस्लामिया को धन और संसाधनों की बहुत कमी रहती थी. रजवाड़े और पैसे वाले लोग, अंग्रेज़ी हुकूमत के डर से इसकी आर्थिक मदद करने से कतराते थे. इसके चलते 1925 के बाद से ही यह बड़ी आर्थिक तंगी में घिर गया. ऐसा लगने लगा कि यह बंद हो जाएगा. लेकिन गांधी जी ने कहा कि कितनी भी मुश्किल आए, स्वदेशी शिक्षा का पैरोकार जामिया किसी कीमत पर बंद नहीं होना चाहिए. उन्होंने कहा, ‘‘जामिया के लिए अगर मुझे भीख भी मांगनी पड़े तो मैं वह भी करूंगा.”

इन लोगों की मदद से बचा था जामिया

जब अंग्रेजों के डर से लोगों ने जामिया को चंदा देना बंद कर दिया तो गांधीजी ने जमनालाल बजाज, घनश्याम दास बिड़ला और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय सहित कई लोगों से जामिया की आर्थिक मदद करने को कहा. आज जामिया कुलपति ऑफिस कंपाउंड में फ़ाइनेंस ऑफिस की इमारत ‘जमनालाल बजाज हाउस‘ के नाम से जानी जाती है. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बेटे देवदास ने जामिया में एक शिक्षक के रूप में काम किया था. गांधीजी के पोते रसिकलाल ने भी जामिया में पढ़ाई की थी.

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